चाय की टपरी और सिगरेट के सुट्टे...........!
चाय की टपरी और सिगरेट के सुट्टे...........! बात उन दिनों की है जब मैं अपने बुरे दौर से गुजर रहा था। मुझे कुछ भी समझ नही आ रहा था कि क्या करूं और क्या नहीं करूं। इस बुरे दौर में एक चीज थी जिसने मेरा पूरा साथ दिया। वो थी सिगरेट । बस सिगरेट और चाय पीने के लिए चाय की टपरी पर चला जाता था। चाय की टपरी पर बैठने के लिए कोई खास जगह तो होती नहीं है। लोहे के खाली ड्रम और वही एक कोना । इस बहाने अपने आप को अपनी पुरानी यादों से भी बाहर निकालने का मोका मिल जाता था। घंटो चाय की टपरी पर बैठ जाता था और मैं यही सोचता था कि किसी एक इंसान के धोका देने से ये दुनिया धोखेबाज नही हैं। जब मैं अच्छा और वफादार हूं तो ये दुनिया भी वैसी ही है जैसा मैं इसको देखता हूं। वैसे भी अभी मेरे पास न कोई काम धंधा था और न कोई नौकरी। जेब में पैसे नही थे । बस पेटीएम में 200 - 300 रू थे । वो भी सोच समझकर खर्च करता था । क्योंकि चाय की टपरी पर जाकर बैठने के लिए भी पैसे चाहिए। फिर भी पॉजिटिव इतना रहता था कि आज ही शोरूम पर जाकर ऑडी खरीद कर ले आऊंगा। एक बार ऐसे ही चाय की टपरी पर जाकर बैठ गया । मेरा चाय की टपरी पर जाकर बैठने...