लिखते लिखते देखो ना यार......

जिंदगी के सफर में अकेला मुसाफिर बन कर चलता आया हूं।

कभी शब्दों का साथ मिला, तो कभी कोरे कागजों को भरता आया हूं।


लिखते लिखते देखो ना यार......

किस्मत और मेरा नसीब मुझे किस मोड़ पर ले आया हैं।

किसी अंजान शख्स के दिल को छू सकू, 

मेरे अल्फाज और मेरा अंदाज कुछ ऐसे रंग लाया हैं।


दोस्त कभी थे , कभी न सही।

कुछ अपनो ने छोड़ा, तो अनजानों ने थामा ये हाथ सही।

जज्बातों का जब जब तूफान उमड़ उठा सीने में, रिसती गई पन्नो पर अरमानों की स्याही सही।


सोचता हूं कि अगर मेरी लिखने की आदत न होती तो क्या होता ?

क्या मेरे सीने में छुपे दर्द और खुशी को तुमने सुना होता।


होठों का क्या है, ये तो झूठ बोलना भी सिख लेते है।

काश कभी आंखों में छुपी बातों को तुमने पढ़ा होता


आज ये कागज और कलम मेरे हमदर्द बन चुके है।

जिनका साथ कभी न छूटे, वो हमसफर बन चुके है।


कहते है जिंदगी बड़ी लंबी हैं, अकेले गुजरना आसान नहीं हैं, 

यूंही इसी तरह लिखता रहूं, जीत सकूं आपके दिल को, बस यही एक ख्वाहिश हैं मेरी।



Comments

  1. बहुत सुन्दर...मन के अहसासों को कागज़ पे उतरना सिर्फ वही एक पल होता है...अगर लिखने की आदत ना भी होती ...अह्सास समझने वाले को शब्दोँ की जरुरत नही होती..

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